नात लिरिक्स

Mustafa Ke Sahaba Mein Yaaro Koi Farooq Jaisa Nahin Hai

मुस्तफ़ा के सहाबा में यारो कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

नात ख़्वान: हाफ़िज़ ताहिर क़ादरीशायर: सैफ़ क़ादरी इलाहाबादीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मुस्तफ़ा का यार ! 'उमर !सच की है ललकार ! 'उमर !बातिल पे वार ! 'उमर !हक़ की है तलवार ! 'उमर !'आसिफ़-ओ-सालार ! 'उमर !मेरा दिलदार ! 'उमर !प्यार है बस प्यार ! 'उमर !

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं हैजो नहीं मानता है 'उमर को, वो तो सच्चा मुसलमाँ नहीं है

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

जिन के इस्लाम से बाब-ए-का'बा खुलाजिन की इक ज़र्ब से थम गया ज़लज़लाजिन का ख़त पा के दरिया रवाँ हो गयावो ख़लीफ़ा 'उमर हैं नबी की दु'आ

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

मुस्तफ़ा जान-ए-रहमत के हैं जो वज़ीरक़ुत्ब-ओ-अब्दाल हैं जिन के दर के फ़क़ीरअहल-ए-ईमान करते हैं जिन की सनावो ख़लीफ़ा 'उमर हैं नबी की दु'आ

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

जो न माने शह-ए-दीन का फ़ैसलाउस का सर तन से करते हैं फ़ौरन जुदाजिन की हर इक अदा में है रब की रिज़ावो ख़लीफ़ा 'उमर हैं नबी की दु'आ

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

मेरा ईमान 'उमर !है मेरी जान 'उमर !मेरी पहचान 'उमर !है मेरी शान 'उमर !

जिन पे आक़ा की हर दम 'इनायात हैंजिन की मर्ज़ी पे भी उतरीं आयात हैंजिन को पहलू में आक़ा ने दी है जगहवो ख़लीफ़ा 'उमर हैं नबी की दु'आ

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

नाम से जिन के कुफ़्फ़ार थर्रा उठेजिन की हैबत से शैतान भी डर गएआज भी जिन का हर सम्त है दबदबावो ख़लीफ़ा 'उमर हैं नबी की दु'आ

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

जिन को आल-ए-नबी से बड़ा प्यार हैजान-ओ-दिल से फ़िदा जिन पे संसार हैसैफ़ ! जो हैं शह-ए-दीन का मो'जिज़ावो ख़लीफ़ा 'उमर हैं नबी की दु'आ

मुस्तफ़ा के सहाबा में, यारो ! कोई फ़ारूक़ जैसा नहीं है

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।