मुझ पे भी चश्म-ए-करम, ए मेरे आक़ा ! करनाहक़ तो मेरा भी है रहमत का तक़ाज़ा करना
मैं कि ज़र्रा हूँ मुझे वुसअ'त-ए-सहरा दे देकि तेरे बस में है क़तरे को भी दरिया करना
मैं हूँ बे-कस, तेरा शेवा है सहारा देनामैं हूँ बीमार, तेरा काम है अच्छा करना
तू किसी को भी उठाता नहीं अपने दर सेकि तेरी शान के शायाँ नहीं ऐसा करना
तेरे सदक़े ! वो उसी रंग में ख़ुद ही डूबाजिस ने, जिस रंग में चाहा मुझे रुस्वा करना
ये तेरा काम है, ए आमिना के दुर्र-ए-यतीम !सारी उम्मत की शफ़ाअ'त तन-ए-तन्हा करना
कसरत-ए-शौक़ से औसान मदीने में है गुमनहीं खुलता कि मुझे चाहिए क्या क्या करना !
ये तमन्ना-ए-मोहब्बत है कि, ए दावर-ए-हश्र !फ़ैसला मेरा सुपुर्द-ए-शह-ए-बतहा करना
आल-ओ-असहाब की सुन्नत, मेरा मेअ'यार-ए-वफ़ातेरी चाहत के एवज़, जान का सौदा करना
शामिल-ए-मक़्सद-ए-तख़्लीक़ ये पहलु भी रहाबज़्म-ए-आलम को सजा कर तेरा चर्चा करना
ये सराहत "वरफ़अ'ना लक ज़िक्रक" में हैतेरी तारीफ़ कराना, तुझे ऊँचा करना
तेरे आगे वो हर इक मंज़र-ए-फ़ितरत का अदबचाँद-सूरज का वो पहरों तुझे देखा करना
दुश्मन आ जाए तो उठ कर वो बिछाना चादरहुस्न-ए-अख़्लाक़ से ग़ैरों को वो अपना करना
उन सहाबा की ख़ुश-अतवार निगाहों को सलामजिन का मस्लक था तवाफ़-ए-रुख़-ए-ज़ेबा करना
मुझ पे महशर में, नसीर ! उन की नज़र पड़ ही गईकहने वाले इसे कहते हैं "ख़ुदा का करना"
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