नात लिरिक्स

Maut Ki Aaghosh Mein Jab Thak Ke So Jati Hai Maa

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँ

शायर: रज़ा सिरसिवीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँतब कहीं जा कर के थोड़ा सा सुकूँ पाती है माँ

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँतब कहीं जा कर, रज़ा ! थोड़ा सुकूँ पाती है माँ

फ़िक्र में बच्चों की कुछ इस तरह घुल जाती है माँनौजवाँ होते हुए बूढ़ी नज़र आती है माँ

माँगती ही कुछ नहीं अपने लिए अल्लाह सेअपने बच्चों के लिए दामन को फैलाती है माँ

रूह के रिश्तों की ये गहराइयाँ तो देखिएचोट लगती है हमारे और चिल्लाती है माँ

पहले बच्चों को खिलाती है सुकून-ओ-चैन सेबा'द में जो कुछ बचे वो शौक़ से खाती है माँ

भूका सोने ही नहीं देती यतीमों को कभीजाने किस किस से, कहाँ से माँग कर लाती है माँ

जब खिलौने को मचलता है कोई ग़ुर्बत का फूलआँसुओं के साज़ पर बच्चे को बहलाती है माँ

गुमरही की गर्द न जम जाए मेरे लाल परबारिश-ए-ईमान में यूँ रोज़ नहलाती है माँ

अपने पहलू में लिटा कर रोज़ तोते की तरहएक बारह पाँच चौदह हम को रटवाती है माँ

कब ज़रूरत हो मेरी बच्चे को, इतना सोच करजागती रहती है ममता और सो जाती है माँ

जाने कितनी बर्फ़ सी रातों में ऐसा भी हुआबच्चा तो छाती पे है गीले में सो जाती है माँ

हड्डियों का रस पिला कर अपने दिल के चैन कोकितनी ही रातों में ख़ाली पेट सो जाती है माँ

घर से जब परदेस जाता है कोई नूर-ए-नज़रहाथ में कुरआन ले कर दर पे आ जाती है माँ

काँपती आवाज़ से कहती है, बेटा ! अलविदा'सामने जब तक रहे हाथों को लहराती है माँ

जब परेशानी में घिर जाते हैं हम परदेस मेंआँसुओं को पोंछने ख़्वाबों में आ जाती है माँ

चाहे हम ख़ुशियों में माँ को भूल जाएँ, दोस्तो !जब मुसीबत सर पे पड़ती है तो याद आती है माँ

दूर हो जाती है सारी 'उम्र की उस दम थकनब्याह कर बेटे की जब घर में दुल्हन लाती है माँ

छीन लेती है वही अक्सर सुकून-ए-ज़िंदगीप्यार से जिस को बियाह के घर में ले आती है माँ

बा-वफ़ा ख़िदमत-गुज़ार आ जाए जो घर में दुल्हनसारा घर उस के हवाले कर सुकूँ पाती है माँ

बेटा कितना ही बुरा हो पर पड़ोसन के हुज़ूररोक कर जज़्बात को बेटे के गुन गाती है माँ

अल्लाह अल्लाह ! भूल कर हर इक सितम को रात दिनपोती पोते से शिकस्ता दिल को बहलाती है माँ

शादियाँ कर कर के बच्चे जा बसे परदेस मेंदिल खतों से और तस्वीरों से बहलाती है माँ

ज़ब्त तो देखो कि इतनी बे-रुख़ी के बावुजूदबद-दु'आ बेटे को देती है न पछताती है माँ

जब जवाँ बेटी हो घर में और कोई रिश्ता न होरोज़ एक एहसास की सूली पे चढ़ जाती है माँ

मरते दम बच्चे न आएँ घर अगर परदेस सेअपनी दोनों पुतलियाँ चौखट पे रख जाती है माँ

साल भर में या कभी हफ़्ते में जुमे'रात कोज़िंदगी भर का सिला इक फ़ातिहा पाती है माँ

प्यार कहते हैं किसे और मामता क्या चीज़ हैकोई उन बच्चों से पूछे जिन की मर जाती है माँ

शुक्रिया हो ही नहीं सकता कभी माँ का अदामरते मरते भी दु'आ जीने की दे जाती है माँ

मौत की आग़ोश में जब थक के सो जाती है माँतब कहीं जा कर, रज़ा ! थोड़ा सुकूँ पाती है माँ

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।