नात लिरिक्स

Marhaba Kya Rooh Parwar Hai Nazara Noor Ka | Subh Taiba Mein Hui Bat.ta Hai Bada Noor Ka With Tazmeen

मरहबा क्या रूह-परवर है नज़ारा नूर का | सुब्ह तयबा में हुई बटता है बाड़ा नूर का तज़मीन के साथ

नात ख़्वान: मुहम्मद रफ़ीक़ रज़ा क़ादरी रज़वीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मरहबा क्या रूह-परवर है नज़ारा नूर काफ़र्श से ता-'अर्श फैला है उजाला नूर काताजदार-ए-शर्क़ साइल बन के निकला नूर कासुब्ह तयबा में हुई बटता है बाड़ा नूर कासदक़ा लेने नूर का आया है तारा नूर का

जश्न-ए-नूरानी है हर जानिब है चर्चा नूर काअंजुमन-आरा हुआ मक्के में का'बा नूर कामाह-ए-हक़ तशरीफ़ लाया बन के क़िब्ला नूर काबारहवीं के चाँद का मुजरा है सज्दा नूर काबारह बुर्जों से झुका एक इक सितारा नूर का

बढ़ गया पा कर जबीन-ए-नूर रुत्बा नूर कादूर पहुँचा नूर की दुनिया से शोहरा नूर काअल्लाह अल्लाह कोई देखे तो नसीबा नूर कातेरे ही माथे रहा, ऐ जान ! सेहरा नूर काबख़्त जागा नूर का, चमका सितारा नूर का

नूर की सरकार में आया है मँगता नूर काहै यही दुर-बार दरबार-ए-मु'अल्ला नूर काएक मुद्दत से दिल-ए-मुज़्तर है प्यासा नूर कामैं गदा तू बादशाह भर दे पियाला नूर कानूर दिन दूना तिरा, दे डाल सदक़ा नूर का

फ़र्क़-ए-अनवर नूर की, दस्तार चेहरा नूर कासादगी में भी है इक अंदाज़ प्यारा नूर काकज-कुलाही पर कुछ ऐसा रो'ब छाया नूर काताज वाले ! देख कर तेरा 'इमामा नूर कासर झुकाते हैं इलाही बोल-बाला नूर का

किस क़दर मसरूर है हर एक मँगता नूर कासब को क़िस्मत से सिवा मिलता है हिस्सा नूर काभीड़ है दरबार में, जारी है सदक़ा नूर काजो गदा देखो लिए जाता है तोड़ा नूर कानूर की सरकार है क्या इस में तोड़ा नूर का

तुझ से मक्का नूर का, तुझ से मदीना नूर कातुझ से क़िब्ला नूर का, है तुझ से का'बा नूर कातुझ से जिस रिश्ते को निस्बत है वो रिश्ता नूर कातेरी नस्ल-ए-पाक में है बच्चा बच्चा नूर कातू है 'ऐन-ए-नूर तेरा सब घराना नूर का

बख़्त अल्लाहु ग़नी 'उस्माँ ! तुम्हारा नूर काअख़्तर-ए-क़िस्मत है या माह-ए-दो-हफ़्ता नूर काख़िल'अत-ए-नूरुन-'अला-नूरिन मिला क्या नूर कानूर की सरकार से पाया दोशाला नूर काहो मुबारक तुम को, ज़ुन्नूरैन ! जोड़ा नूर का

चाँदनी लाता जिधर उँगली उठाते महद मेंनूर बरसाता जिधर उँगली उठाते महद मेंबा-अदब आता जिधर उँगली उठाते महद मेंचाँद झुक जाता जिधर उँगली उठाते महद मेंक्या ही चलता था इशारों पर खिलौना नूर का

दोनों तारों में है ख़ुर्शीद-ए-नुबुव्वत की चमकदोनों फूलों में है गुलज़ार-ए-रिसालत की महकदोनों शहज़ादों में है शाह-ए-दो-'आलम की झलकएक सीने तक मुशाबेह, इक वहाँ से पाउँ तकहुस्न-ए-सिब्तैन इन के जामों में है नीमा नूर का

ये अदा, ये तौर, ये अंदाज़-ए-शाह-ए-दो-जहाँहू-ब-हू गोया सरापा-ए-हसीन-ए-ला-मकाँजैसे शम'-ए-मन-रआनी क़द-रअल-हक़ जौ-फ़िशाँसाफ़ शक्ल-ए-पाक है दोनों के मिलने से 'इयाँख़त्त-ए-तौअम में लिखा है ये दो वर्क़ा नूर का

किस क़दर शफ़्फ़ाफ़ है आईना-ए-नूरी-निहादजिस के देखे से ख़ुदा बेसाख़्ता आता है यादबे-नियाज़-ए-हर-सताइश, मा-वरा-ए-हुस्न-ए-दादकाफ़ गेसू, हा दहन, या अब्रू, आँखें 'ऐन-सादकाफ़-हा-या-'ऐन-साद उन का है चेहरा नूर का

ये क़सीदा जो हद-ए-फ़िक्र-ए-रसा से दूर हैजो मज़ामीं की बुलंदी में बहुत मशहूर हैमैं करूँ तख़्मीस, अख़्तर ! कब मिरा मक़दूर हैबस रज़ा-ओ-अहमद-ए-नूरी का फ़ैज़-ए-नूर हैहो गई तज़मीन भी बढ़ कर क़सीदा नूर का

कलाम:इमाम अहमद रज़ा ख़ान

तज़मीन:मौलाना अख़्तर-उल-हामिदी

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