अमीरुल-मो'मिनीन, इमामुल-आदिलीनमुहिब्बुल-मुस्लिमीन, गैज़ुल-मुनाफ़िक़ीन
मुझ को इज़्ज़त ख़ुदा ने है बख़्शीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
जिस को माँगा नबी ने मौला सेजाम जिस को पिलाए उल्फ़त केमुझ को उस शाह की चाकरी दे दीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
पहलु-ए-यार से लगे देखेख़ूब रोज़े में ये मज़े देखेउस के तरफ़ा है क़ुर्बे-सिद्दीक़ीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
रंग फीके थे, कहतसाली थीमेरी हस्ती बिखरने वाली थीदस्ते फ़ारूक़ ने जिला बख़्शीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
ग़म बहुत दूर से गुज़रते हैंकाम बिगड़े हुवे भी बनते हैंजब से तहरीर घर पे लिखवालीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
आल-ओ-असहाब से मोहब्बत हैदस्ते-फ़ारूक़ ने भरे कासेमैं हूँ अल्वी, सिद्दीक़ी, उस्मानीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
उनकी ताईद में वही आएबात उनकी कही सुनी जाएउनको हासिल मक़ामे-महबूबीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
एक पनघट से शेर और बकरीअहदे फ़ारूक़ में पिये पानीलाओ तो दूसरी मिसाल ऐसीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
हैदरी प्यार उन से करते हैंसब हुसैनी भी उन पे मरते हैंये वसीयत है उनको मौला कीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
शर्फ़-ओ-इज़्ज़त पे, नेक नामी पेनाज़ है मुझ को इस ग़ुलामी पेहै सनद पुल से पार होने कीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
पीठ मजबूत क्यों न हो मेरीपीठ पर है जो दस्ते फ़ारूक़ीमुझ पे राशिद चले न दुश्मन कीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
मुझ को इज़्ज़त ख़ुदा ने है बख़्शीमैं ग़ुलाम-ए-ग़ुलाम-ए-फ़ारूक़ी
अमीरुल-मो'मिनीन, इमामुल-आदिलीनमुहिब्बुल-मुस्लिमीन, गैज़ुल-मुनाफ़िक़ीन
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