नात लिरिक्स

Madine Ki Galiyon Ke Dilkash Nazare Nazar Mein Basane Ko Ji Chahta Hai

मदीने की गलियों के दिलकश नज़ारे नज़र में बसाने को जी चाहता है

शायर: अनस बिजनोरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

मदीने में जाने को दिल चाहता है, मदीने में जाने को दिल चाहता है

मदीने की गलियों के दिलकश नज़ारे, नज़र में बसाने को जी चाहता हैनबी का वो रौज़ा, सुनहरी वो जाली, वहाँ आने जाने को जी चाहता है

वो तयबा मुक़द्दस के पुर-कैफ़ जल्वे, वो ख़ाक-ए-मदीना के पुर-नूर ज़र्रेमदीने की वो ठंडी ठंडी हवाएँ, वहीं घर बनाने को जी चाहता है

वो शहर-ए-मदीना मुहम्मद का मस्कन, वो प्यारे नबी की तजल्ली का गुलशनसुनूँ जा के मैं भी वहाँ की अज़ानें, वहीं दिन बिताने को जी चाहता है

मदीने में रहते हैं मेरे पयम्बर, शफ़ी'-उल-वरा साक़ी-ए-हौज़-ए-कौसरमैं खो जाऊँ शहर-ए-मदीना में जा कर, वहीं जाँ लुटाने को जी चाहता है

मिला जिन को नबियों का शर्फ़-ए-इमामत, वही तो हैं सरताज-ए-ख़त्म-ए-नुबुव्वतउन्हीं के तराने, उन्हीं के क़सीदे, सभी को सुनाने को जी चाहता है

हलीमा की क़िस्मत का चमका सितारा, वो सारे ज़माने को जिस ने निखाराबिलाल-ओ-अबू-ज़र का वो 'इश्क़-ए-कामिल, दिलों में सजाने को जी चाहता है

उसी जान-ए-'आलम पे सदक़े मैं जाऊँ, उसी काली कमली में मुँह को छुपाऊँग़मों से भरी है मेरी ज़िंदगानी, वहीं मुँह छुपाने को जी चाहता है

इलाही ! अनस की ये 'उम्र-ए-रवाँ भी, ग़मों में गुज़रती चली जा रही हैख़ुदा ! भेज दे हम को शहर-ए-मदीना, कि अब मुस्कुराने को जी चाहता है

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