नात लिरिक्स

Jab Se Mujh Ko Nisbat-e-Makhdoom-e-Simnaani Mili

जब से मुझ को निस्बत-ए-मख़्दूम-ए-सिमनानी मिली

नात ख़्वान: उस्मान ग़नी अशरफ़ीशायर: फ़ाज़िल मैसूरीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

जब से मुझ को निस्बत-ए-मख़्दूम-ए-सिमनानी मिलीमुश्किलें जितनी भी आईं, उन में आसानी मिली

तख़्त-ए-सिमनानी की रानाई को ठोकर मार करदोनों 'आलम की मेरे अशरफ़ को सुल्तानी मिली

अशरफ़-ए-सैफ़-ए-ज़बाँ की देखिए रूहानियतबे-ज़बाँ मूरत को भी तहरीक-ए-जिस्मानी मिली

या ख़ुदा ! ये ख़ुल्द है या है किछौछे की ज़मींमुझ को हर सूरत यहाँ की जानी पहचानी मिली

नाम-ए-अशरफ़ ले के कश्ती में हुआ था मैं सवारसर-निगूँ हो कर मुझे दरिया की तुग़्यानी मिली

अल्लाह अल्लाह ! ये 'अता-ए-ग़ौस-ओ-ख़्वाजा है, हमेंबारगाह-ए-हज़रत-ए-महबूब-ए-यज़्दानी मिली

ढूँडने वालो ने ढूँडी जा-ब-जा, फ़ाज़िल ! मगरआस्तान-ए-अशरफ़ी पर मेरी पेशानी मिली

केवल उपलब्ध श्रेय दिखाए गए हैं; अनुपलब्ध जानकारी का अनुमान नहीं लगाया गया।