नात लिरिक्स

Hai Sitamgar Zamana Pareshan Hun Main | Kamli Wale Ki Nagri Mein Ghar Chahiye

है सितमगर ज़माना परेशाँ हूँ मैं | कमली वाले की नगरी में घर चाहिए

नात ख़्वान: फ़ुर्क़ान वज़ीरशायर: मुफ़्ती अब्दुल्लाह बिन अब्बासउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

है सितमगर ज़माना, परेशाँ हूँ मैंकमली वाले की नगरी में घर चाहिएजिस सुब्ह हाज़िरी जा के रौज़े पे होहाँ मुझे एक ऐसी सहर चाहिए

उन की यादों का मर्कज़ है सीना मेरादूर रह कर तो मुश्किल है जीना मेरासब्ज़-गुंबद तले हो कभी हाज़िरीवो गली चाहिए, वो नगर चाहिए

है सितमगर ज़माना, परेशाँ हूँ मैंकमली वाले की नगरी में घर चाहिए

है हसीं चाँद भी मानता हूँ मगरउस पे हैं छाइयाँ आ रहा है नज़रजो हुआ गोदी-ए-आमिना में तुलू'बस हमें एक वो ही क़मर चाहिए

है सितमगर ज़माना, परेशाँ हूँ मैंकमली वाले की नगरी में घर चाहिए

उन की यादें हसीं-तर सताएँ बहुतदूरियों के ये लम्हें रुलाएँ बहुतजिस से महबूब को रू-ब-रू देख लूँमेरे मौला ! मुझे वो नज़र चाहिए

है सितमगर ज़माना, परेशाँ हूँ मैंकमली वाले की नगरी में घर चाहिए

जान दे दूँ मैं, आक़ा ! तेरे नाम परफिर करूँ फ़ख़्र मैं अपने इस काम परबे-ख़तर कूद जाऊँ बड़े शौक़ सेआतिश-ए-'इश्क़ का इक बहर चाहिए

है सितमगर ज़माना, परेशाँ हूँ मैंकमली वाले की नगरी में घर चाहिए

पुर-फ़ितन दौर है, ज़ुल्म का ज़ोर हैकुफ़्र की साज़िशें, फ़िस्क़ का शोर हैहो मुयस्सर रियासत-ए-मदीना हमेंऔर फिर से हमें इक 'उमर चाहिए

है सितमगर ज़माना, परेशाँ हूँ मैंकमली वाले की नगरी में घर चाहिए

देख लूँ, इब्न-ए-'अब्बास ! बे-ताब हूँरात-दिन सोचता एक ही ख़्वाब हूँ'आज़मीन-ए-मदीना से मिल जाऊँ मैं'इश्क़-ए-ख़ैर-उल-वरा का सफ़र चाहिए

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