ग़म हो गए बे-शुमार, आक़ा !बंदा तेरे निसार, आक़ा !
बिगड़ा जाता है खेल मेराआक़ा ! आक़ा ! संवार, आक़ा !
मंजधार पे आ के नाव टूटीदे हाथ कि हूं मैं पार, आक़ा !
टूटी जाती है पीठ मेरीलिल्लाह ! ये बोझ उतार, आक़ा !
हल्का है अगर हमारा पल्लाभारी है तेरा वक़ार, आक़ा !
मजबूर हैं हम तो फ़िक्र क्या हैतुम को तो है इख़्तियार, आक़ा !
मैं दूर हूं, तुम तो हो मेरे पाससुन लो मेरी पुकार, आक़ा !
मुझ सा कोई ग़म-ज़दा न होगातुम सा नहीं ग़म-गुसार, आक़ा !
गिर्दाब में पड़ गई है कश्तीडूबा डूबा, उतार, आक़ा !
तुम वो कि करम को नाज़ तुम सेमैं वो कि बदी को अ़ार, आक़ा !
फिर मुँह न पड़े कभी ख़िज़ाँ कादे दे ऐसी बहार, आक़ा !
जिस की मरज़ी ख़ुदा न टालेमेरा है वो नाम-दार आक़ा
है मुल्क-ए-ख़ुदा पे जिस का क़ब्ज़ामेरा है वोह कामगार आक़ा
सोया किये ना-बकार बंदेरोया किये ज़ार-ज़ार आक़ा
क्या भूल है इन के होते कहलाएंदुन्या के ये ताजदार आक़ा
उन के अदना गदा पे मिट जाएंऐसे ऐसे हज़ार आक़ा
बे-अब्र-ए-करम के मेरे धब्बे'ला तग़्सिलुहल-बिह़ार', आक़ा !
इतनी रह़मत रज़ा पे कर लो'ला यक़रुबुहुल-बवार', आक़ा !
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