नात लिरिक्स

Falak Se Rahmaton Ka Ik Samandar Bhej Deta Hai

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता है

शायर: मलिक मुबश्शिर साइम अलवीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

हरम की सिम्त बढ़ने लगती है जब अबरहा की फ़ौजमेरा मौला अबाबीलों का लश्कर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

ख़लीलुल्लाह जब ता'मीर-ए-बैतुल्लाह करते हैंइलाही ख़ुल्द से असवद सा पत्थर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

ख़ुदा चाहे अगर महबूब को दीदार करवानाउन्हें पैग़ाम आधी रात को घर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

सर-ए-मैदान हैदर के न हिस्से में शिकस्त आएज़ुबाँ पर ना'रा-ए-अल्लाहु-अकबर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

रसूलुल्लाह और सिद्दीक़ ग़ार-ए-सौर में पहुँचेबना कर मकड़ी का जाला, कबूतर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

जहाँ को 'आइशा की शान दिखलाने की बात आएतो वो जन्नत को हुजरे के ही अंदर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

ख़ुदा, 'औरत पे पर्दा फ़र्ज़ करने के लिए, साइम !'उमर की राय को आयत बना कर भेज देता है

फ़लक से रहमतों का इक समंदर भेज देता हैवो ख़ालिक़ रोज़ धरती का मुक़द्दर भेज देता है

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