दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की हैनवाज़िशों की मेरे रब ने इन्तिहा की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
ये आफ़ताब, ये मेहताब, केहकशां, अन्जुमजो रोशनी है जहाँ में वो मुस्तफ़ा की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
मैं उम्मती हूँ मुह़म्मद का फ़ख्र है मुझकोख़ुदा ने ऐसी सआदत मुझे अता की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
बना के उस्वा-ए-ह़स्ना को बेहतरीन मिसालनबी के चेहरे की तौसीफ वद्दोहा की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
हुज़ूर अब तो करम की निग़ाह हो जाएजो हाज़री के लिए दिल से इल्तिज़ा की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
मैं उनकी ज़ाते-गिरामी पे क्यूँ न जाऊं निसारवो जिसने मेरे हर एक दर्द की दवा की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
नबी के इश्क़ ने सैराब कर दिया हमदमनबी की ज़ात से है जो भी ताबना की है
दुरूद पड़ते हुवे जब भी इब्तिदा की है
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