मदीना... मदीना...मदीना... मदीना...
आ जाओ गुनहगारो, बे-ख़ौफ़ चले आओसरकार की रहमत तो है आम मदीने में
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंहसीं दुनिया के सब मंज़र निग़ाहें भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
मिले जो भीक आक़ा के दरे दौलत से मंगतों कोतो शाहाने ज़माना की सखाएँ भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
जो साइल मोहसिने आज़म के एहसां याद रखते हैंउन्हें सब ताजदारों की अताएँ भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
जो चूमे नक़्शे पा उनके सुरूरे क़ल्ब मिलता हैहो निकली दर्द में जितनी वो आहें भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
छुपा लेते हैं जिस को भी मेरे सरकार दामन मेंउन्हें आग़ोशे मादर की पनाहें भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
बसा हो नज़र में जिस की रुखे महबूब का जल्वाउसे शम्सो क़मर की सब ज़ियाएँ भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
मैं देखूं अपने जुर्मो को तो दिल मेरा दहल जाएजो रहमत उनकी याद आई सजाएं भूल जाती हैं
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
सुनू जब नात मैं अहमद शबे असरा के दूल्हा कीमुझे अग़्यार की सिफ़्तो सनाएँ भूल जाती है
दरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैंदरे सरकार पे जा कर ख़ताएँ भूल जाती हैं
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