बस्ती मेरे वीरान मुक़द्दर की बसा दीमाँ जी की दुआओं ने मेरी बात बना दी
आसूदा मेरी माँ को खुदा रखे कह जिस नेअजमत दर ए जेहरा की मेरे दिल में बसा दी
तैयार हमेशा इसे खिदमत को है पायाजब भी सर ए शब् उठ के में ने सदा दी
मोसम की तमाज़त ने किया जब भी परेशानशफ्क्क़त के दुपट्टे से मुझे ठंडी हवा दी
दोपहर के आजार को खुद सबर से झेलाराहत भरी हर शाम मेरे नाम लगा दी
खुशियों की फुवारों से मुझे कर के शराबूरहर ग़म की मेरी रह से दीवार गिरा दी
है माँ की इता'अत का सिला गुलशन ए जन्नतअफ्लाक से होती है शब् ओ रोज़ मुनादी
रहमत ने वहीं ले लिया आघोष में बढ़ करफारूकी मेरी माँ ने मुझे जब भी दुआ दी
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