नात लिरिक्स

Aye Qalam Zara Tu Sambhal Ke Chal Ye Maqam-e-Wahm-o-Guman Nahin | Wo Kamal-e-Husn-e-Huzoor Hai With Tazmeen

ऐ क़लम ज़रा तू सँभल के चल ये मक़ाम-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहीं | वो कमाल-ए-हुस्न-ए-हुज़ूर है तज़मीन के साथ

नात ख़्वान: समीर रज़ा इलाहाबादीउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu

ऐ क़लम ! ज़रा तू सँभल के चल, ये मक़ाम-ए-वहम-ओ-गुमाँ नहींहै नबी के हुस्न का तज़्किरा, किसी और का ये बयाँ नहींकरे उन की मदह का हक़ अदा, ये किसी में ताब-ओ-तवाँ नहींवो कमाल-ए-हुस्न-ए-हुज़ूर है कि गुमान-ए-नक़्स जहाँ नहींयही फूल ख़ार से दूर है, यही शम'अ है कि धुवाँ नहीं

कहाँ उन के फ़ज़्ल-ओ-कमाल का कहो आज चश्मा रवाँ नहींहै सुख़न में उन के मिठास बस, कहीं तल्ख़ियों का निशाँ नहींब-ख़ुदा रसूल-ए-करीम सा कहीं कोई अहल-ए-ज़बाँ नहींमैं निसार तेरे कलाम पर, मिली यूँ तो किस को ज़बाँ नहींवो सुख़न है जिस में सुख़न न हो, वो बयाँ है जिस का बयाँ नहीं

कहाँ जा रहे हो इधर उधर, नहीं मिल सकेगी कोई डगरमेरे मुस्तफ़ा का ही पाक दर है ख़ुदा-शनासी की रह-गुज़रहैं रसूल-ए-हक़, शह-ए-बहरोबर, ब-ख़ुदा ख़ुदा के पयामबरब-ख़ुदा ख़ुदा का यही है दर, नहीं और कोई मफ़र मक़रजो वहाँ से हो यहीं आ के हो, जो यहाँ नहीं तो वहाँ नहीं

वो अमानतों के अमीं हुए, वो चराग़-ए-नूर-ए-यक़ीं हुएवही सब से रौशन-जबीं हुए, ब-ख़ुदा सभी से हसीं हुएवही शाह-ए-दुनिया-ओ-दीं हुए, वही शहर-ए-तयबा मकीं हुएवही ला-मकाँ के मकीं हुए, सर-ए-'अर्श तख़्त-नशीं हुएवो नबी है जिस के हैं ये मकाँ, वो ख़ुदा है जिस का मकाँ नहीं

ऐ हबीब-ए-रब शह-ए-बहर-ओ-बर ! तेरी 'अज़मतें हैं बुलंद-तरतुझे नूर मौला का मान कर तेरा कलमा पढ़ने लगा हजरतेरी शान समझेगा क्या बशर, तेरी ज़ात सब से है मो'तबरसर-ए-'अर्श पर है तेरी गुज़र, दिल-ए-फ़र्श पर है तेरी नज़रमलकूत-ओ-मुल्क में कोई शय नहीं वो जो तुझ पे 'अयाँ नहीं

किसी दुनियादार नवाब का, वो क़सीदा लिक्खेगा क्यूँ भलाजो रसूल-ए-पाक का है गदा, वो लिए है शान-ओ-अदा जुदासुनो तुम भी, गौहर-ए-बे-नवा ! ये फ़क़ीर-ए-तयबा की है सदाकरूँ मदह-ए-अहल-ए-दुवल, रज़ा ! पड़े इस बला में मेरी बलामैं गदा हूँ अपने करीम का, मेरा दीन पारा-ए-नाँ नहीं

कलाम:इमाम अहमद रज़ा ख़ान

तज़मीन:महबूब गौहर इस्लामपुरी

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