उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zindagi ko shoabada samjha tha main

ज़िंदगी को शो'बदा समझा था मैं

زندگی کو شعبدہ سمجھا تھا میں

शायर: Zafar Iqbal Zafar6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़िंदगी को शो'बदा समझा था मैं
पत्थरों को आइना समझा था मैं

धूप की यूरिश थी हर इक सम्त से
साया-ए-दीवार से लिपटा था मैं

आईने ही आईने थे हर तरफ़
फिर भी अपने आप में तन्हा था मैं

हादसों से खेलने के बावजूद
आज भी वैसा हूँ कल जैसा था मैं

रोज़ ज़ख़्मी होता था मेरा बदन
पत्थरों के शहर में रहता था मैं

'उम्र-भर अपने त'आक़ुब में 'ज़फ़र'
अपने ही साए से बस उलझा था मैं