उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ek jumbish mein kaT bhi sakte hain

एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं

ایک جنبش میں کٹ بھی سکتے ہیں

शायर: Zafar Iqbal Zafar5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

एक जुम्बिश में कट भी सकते हैं
धार पर रक्खे सब के चेहरे हैं

रेत का हम लिबास पहने हैं
और हवा के सफ़र पे निकले हैं

मैं ने अपनी ज़बाँ तो रख दी है
देखूँ पत्थर ये नम भी होते हैं

ऐसे लोगों से मिलना-जुलना है
साँप जो आस्तीं में पाले हैं

कोई पुरसाँ नहीं ग़मों का 'ज़फ़र'
देखने में हज़ार रिश्ते हैं