उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zehn-o-dil mein KHauf ke jab sarsaraate sanp hain

ज़ेहन-ओ-दिल में ख़ौफ़ के जब सरसराते साँप हैं

ذہن و دل میں خوف کے جب سرسراتے سانپ ہیں

शायर: Tabassum Azmi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ेहन-ओ-दिल में ख़ौफ़ के जब सरसराते साँप हैं
सीधे ख़त भी लगते जैसे आड़े तिरछे साँप हैं

कोई हीला कोई मौक़ा कुछ बहाना चाहिए
ज़हर उगलने के लिए तय्यार बैठे साँप हैं

कब कहाँ किस मोड़ पर डस जाएँ किस को है ख़बर
आगे कितने साँप हैं और पीछे कितने साँप हैं

आदमी में छुप के बैठा नफ़्स का जो नाग है
उस के आगे हेच सब मूज़ी विषैले साँप हैं

उस का अच्छा होना भी उस के लिए है इक अज़ाब
पेड़ से संदल के देखें कितने लिपटे साँप हैं

हम ने भी ख़ुद को 'तबस्सुम' अब ज़मुर्रद कर लिया
सुन रहे हैं हर तरफ़ ही भेस बदले साँप हैं