उर्दू शायरी · ग़ज़ल

diwar-e-waqt par hain nawishte ajib se

दीवार-ए-वक़्त पर हैं नविश्ते अजीब से

دیوار وقت پر ہیں نوشتے عجیب سے

शायर: Tabassum Azmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

दीवार-ए-वक़्त पर हैं नविश्ते अजीब से
रक़्साँ गली गली में हैं साए मुहीब से

हैरत है क्यों जो आईना टूटा हबीब से
ठोकर हमेशा लगती है बिल्कुल क़रीब से

नक्बत का दर्द तरसी नज़र दिल में इज़्तिराब
ग़ुर्बत का कर्ब पोछिए जा कर ग़रीब से

घर के मकीन ख़ैर से लौटें न जब तलक
ख़दशात घेरे रहते हैं दिल को अजीब से

मुख़्लिस भी हों शफ़ीक़ भी क़द्र उन की कीजिए
मिलते हैं ऐसे दोस्त 'तबस्सुम' नसीब से