उर्दू शायरी · ग़ज़ल

niyaz-e-ishq ka namus luTwana bhi aata hai

नियाज़-ए-इश्क़ का नामूस लुटवाना भी आता है

نیاز عشق کا ناموس لٹوانا بھی آتا ہے

शायर: Tabassum Azmi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

नियाज़-ए-इश्क़ का नामूस लुटवाना भी आता है
जो इब्न-उल-वक़्त हैं उन को बदल जाना भी आता है

जो की है दोस्ती सूरज से तो मोहतात भी रहिए
मुलाएम धूप को गुलज़ार झुलसाना भी आता है

ज़रा सी ठेस पर माना बिखर जाते हैं हम लेकिन
हमें रेज़ों को चुन चुन कर सँवर जाना भी आता है

सर-ए-तस्लीम ख़म रखते हैं ये तहज़ीब है अपनी
अगर फ़रमान बेजा हो तो ठुकराना भी आता है

बयाबानों कुहिस्तानों में भटके लाख ये लेकिन
दिल-ए-नाशाद को घर लौट के आना भी आता है