उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zara si baat pe aankhen bhigone lagte the

ज़रा सी बात पे आँखें भिगोने लगते थे

ذرا سی بات پہ آنکھیں بھگونے لگتے تھے

शायर: Zaheen Lakhnawi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़रा सी बात पे आँखें भिगोने लगते थे
हमारे जैसे ख़ुशी में भी रोने लगते थे

उदासी ग़ैर की आँखों में जब भी दिखती थी
उसे भी अपनी ही आँखों में ढोने लगते थे

अजीब क़ुर्ब था तुझ से कि वक़्त-ए-रुख़्सत में
उदास घर के सभी लोग होने लगते थे

हमें पता ही नहीं थी हक़ीक़त-ए-ता'बीर
सवेरा होते ही हम ख़्वाब बोने लगते थे

ग़म-ए-हयात में वहशत का आलम ऐसा था
कि चीख़ते हुए से घर के कोने लगते थे

बस अपने जैसे ही करते थे रतजगे वर्ना
थे ऐसे लोग भी जो रो के सोने लगते थे

तिरी नदी की रवानी में थी कशिश ऐसी
हम अपनी कश्तियाँ ख़ुद ही डुबोने लगते थे