उर्दू शायरी · ग़ज़ल

KHwab palkon par sulagne aur bhi the

ख़्वाब पलकों पर सुलगने और भी थे

خواب پلکوں پر سلگنے اور بھی تھے

शायर: Zaheen Lakhnawi7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ख़्वाब पलकों पर सुलगने और भी थे
आँखों की क़िस्मत में धोके और भी थे

जिस को खोने का तरीक़ा एक ही था
उस को पाने के तरीक़े और भी थे

मुझ को आख़िर तोड़ने की वजह क्या थी
शाख़ पे जब मेरे जैसे और भी थे

दिल को हल्का करने को रोने लगा मैं
जब कि रोने के नतीजे और भी थे

चंद लम्हों की ख़ुशी में भूल बैठा
मेरे ऊपर ग़म के साए और भी थे

मैं अकेला ही पहुँच पाया हूँ मुझ तक
मेरे पीछे आने वाले और भी थी

सब की नज़रें आ के मुझ पर टिक गई थीं
जब कि दुनिया में तमाशे और भी थे