उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zahr ke tir mere chaaron taraf khinchta hai

ज़हर के तीर मिरे चारों तरफ़ खींचता है

زہر کے تیر مرے چاروں طرف کھینچتا ہے

शायर: Qamar Siddiqi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़हर के तीर मिरे चारों तरफ़ खींचता है
क्या अजब शख़्स है अपनों पे हदफ़ खींचता है

फिर वही दिल में उदासी के उमडते बादल
फिर वही सिलसिला-ए-ख़ाक-ओ-ख़ज़फ़ खींचता है

फिर वही क़हर वही फ़ित्ना-ए-दज्जाल के दिन
फिर वही क़िस्सा-ए-अस्हाब-ए-कहफ़ खींचता है

कौन सी सोई हुई प्यास का रिश्ता जागा
आज क्यूँ मुझ को ये सहरा-ए-नजफ़ खींचता है

कौन से लोग थे ज़ुल्मात के सहराओं में
कि जिन्हें मर्तबा-ए-इज़-ओ-शरफ़ खींचता है