उर्दू शायरी · ग़ज़ल

jazba-e-sard sitamgar nahin achchha lagta

जज़्बा-ए-सर्द सितमगर नहीं अच्छा लगता

جذبۂ سرد ستم گر نہیں اچھا لگتا

शायर: Qamar Siddiqi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

जज़्बा-ए-सर्द सितमगर नहीं अच्छा लगता
तेरे चेहरे पे दिसम्बर नहीं अच्छा लगता

आइना देख तो लें देख के हासिल क्या है
अब यहाँ अपना ही पैकर नहीं अच्छा लगता

ग़ालिबन आप ने सच बोला है सो भुक्तो अब
हाकिम-ए-वक़्त का तेवर नहीं अच्छा लगता

इक वही शख़्स लगे जान से प्यारा हम को
और कभी वो भी सरासर नहीं अच्छा लगता

भीड़ है शोर है और दाइमी उकताहट है
शहर का बस यही मंज़र नहीं अच्छा लगता

ख़ैर ये मिलना बिछड़ना तो लगा रहता है
हाँ मगर यादों का दफ़्तर नहीं अच्छा लगता