उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zaban kuchh aur kahti hai nazar kuchh aur kahti hai

ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र कुछ और कहती है

زباں کچھ اور کہتی ہے نظر کچھ اور کہتی ہے

शायर: Yaqoob Usmani7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़बाँ कुछ और कहती है नज़र कुछ और कहती है
ब-ज़ाहिर ये तवज्जोह चारा-गर कुछ और कहती है

ज़माना नग़्मा-पैराई का जब आएगा आएगा
अभी तो शिद्दत-ए-सोज़-ए-जिगर कुछ और कहती है

भला आप और इख़फ़ा-ए-हक़ीक़त ऐ मआ'ज़-अल्लाह
ज़बान-ए-ख़ल्क़ झूटी है अगर कुछ और कहती है

कोई किस तरह धोका खाए इस आतिश-बयानी का
उदासी तेरी ऐ शम-ए-सहर कुछ और कहती है

इसी तश्ख़ीस पर इतरा रहा था एक मुद्दत से
मसीहा देख नब्ज़-ए-बहर-ओ-बर कुछ और कहती है

तिरी अज़्मत का मुंकिर था न हूँ ऐ रहबर-ए-कामिल
अब इस को क्या करूँ मैं रहगुज़र कुछ और कहती है

भरम 'याक़ूब' खुलने ही को है अब आसमानों का
ज़मीं से गर्दिश-ए-श्म्स-ओ-क़मर कुछ और कहती है