उर्दू शायरी · ग़ज़ल

zat jab bhi uDan tak pahunchi

ज़ात जब भी उड़ान तक पहुँची

ذات جب بھی اڑان تک پہنچی

शायर: Fahmida Mosarrat Ahmad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ज़ात जब भी उड़ान तक पहुँची
वुसअ'त-ए-ला-मकान तक पहुँची

जब हक़ीक़त गुमान तक पहुँची
इक नए इम्तिहान तक पहुँची

बात फैलाई थी जो दुश्मन ने
देखो वो मेहरबान तक पहुँची

कश्तियाँ सब जला के आई थी
जब वो तेरे मकान तक पहुँची

इक तिरा नाम क्या लिया हम ने
बात तीर-ओ-कमान तक पहुँची

राज़-दाँ से कही थी चुपके से
बात सारे जहान तक पहुँची

अब तिरे इंतिज़ार में ऐ दोस्त
मुस्कुराहट थकान तक पहुँची

ओढ़ कर ज़ब्त की रिदा पैहम
हौसले की चटान तक पहुँची

आख़िर-ए-शब दुआ 'मसर्रत' की
जा के फिर आसमान तक पहुँची