उर्दू शायरी · ग़ज़ल

guzri thi ek bar jo dil ki gali se main

गुज़री थी एक बार जो दिल की गली से मैं

گزری تھی ایک بار جو دل کی گلی سے میں

शायर: Fahmida Mosarrat Ahmad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गुज़री थी एक बार जो दिल की गली से मैं
दो-चार आज भी हूँ उसी बे-कली से मैं

बे-ज़ार इस क़दर हूँ ग़म-ए-आशिक़ी से मैं
मुझ से ज़रा ख़फ़ा है ख़ुशी और ख़ुशी से मैं

निकली हूँ जब से ढूँडने बे-लौस चाहतें
धोका ही खा रही हूँ बड़ी सादगी से मैं

मा'दूम उस की आँख से पहचान हो गई
जैसे कि मिल रही थी किसी अजनबी से मैं

जिंस-ए-वफ़ा जहान में नायाब क्यों हुई
रो रो के पूछती रही हर आदमी से मैं

अपनी ख़ुशी से वैसे बसर तो न कर सकी
नाराज़ भी नहीं हूँ मगर ज़िंदगी से मैं

मैं ने भी साफ़ लफ़्ज़ों में ग़म से ये कह दिया
पीछा छुड़ा के आई हूँ अफ़्सुर्दगी से मैं

मय-ख़ाना चल के रिंद का ख़ुद पूछता है हाल
मानूस इस तरह से हूँ अब मय-कशी से मैं

जाम-ओ-सुबू नहीं तिरी आँखों से अब पिला
ऐ साक़ी मर न जाऊँ कहीं तिश्नगी से मैं