उर्दू शायरी · ग़ज़ल

bin piye ek KHumar tha kya tha

बिन पिए इक ख़ुमार था क्या था

بن پئے اک خمار تھا کیا تھا

शायर: Fahmida Mosarrat Ahmad10 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

बिन पिए इक ख़ुमार था क्या था
तेरा चेहरा बहार था क्या था

वो रह-ए-इश्क़ में जुनूँ अपना
दिल जो तुझ पर निसार था क्या था

वो मिरा वहम या हक़ीक़त थी
तेरी नज़रों में प्यार था क्या था

बज़्म में तेरी मेहरबाँ थे बहुत
मेरा उन में शुमार था क्या था

वक़्त-ए-रुख़्सत किसी की आँखों में
छाया कैसा ग़ुबार था क्या था

वो भी रोया था दर्द-ए-फ़ुर्क़त में
लग रहा अश्क-बार था क्या था

तेरे दिल में सदा खटकता रहा
बद-गुमानी का ख़ार था क्या था

कर के फिर मेरे ए'तिबार का ख़ून
जो गया है वो यार था क्या था

हम थे उलझन में आप भी चुप थे
कौन सर पर सवार था क्या था

मैं तो मर कर भी मुंतज़िर ही रही
वो तिरा इंतिज़ार था क्या था