उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye mantar bhi purane jam-e-jam bhi

ये मंतर भी पुराने जाम-ए-जम भी

یہ منتر بھی پرانے جام جم بھی

शायर: Faisal Azeem4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये मंतर भी पुराने जाम-ए-जम भी
बहुत देखे हैं ये नक़्श-ए-क़दम भी

ये नाटक हो रहे हैं मुद्दतों से
कहाँ तक तालियाँ पीटेंगे हम भी

नए सज्दे नई हैं सज्दा-गाहें
रखे जाएँगे बोसीदा सनम भी

अभी पर्दे उठेंगे देख लेना
नज़र आएँगे पस-मंज़र में हम भी