उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye kaise numu ke silsile hain

ये कैसे नुमू के सिलसिले हैं

یہ کیسے نمو کے سلسلے ہیں

शायर: Hafeez Jauhar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये कैसे नुमू के सिलसिले हैं
शाख़ों पे गुलाब जल-बुझे हैं

फैली है सितम की आग हरसू
हर सम्त अलाव जल रहे हैं

हर आँख सवाल कर रही है
हर दिल में हज़ार वसवसे हैं

बरसी हैं बलाएँ आसमाँ से
धरती पे अज़ाब उग रहे हैं

महफ़ूज़ नहीं पनाह-गाहें
क्या अक़्ल-ए-रसा के मो'जिज़े हैं

बाज़ार लहू की वहशतों के
तहज़ीब के नाम पर सजे हैं

ग़ैरों पे है इंहिसार अपना
सोचें भी उधार माँगते हैं

सूरज भी है दस्तरस में लेकिन
हम रौशनी को तरस गए हैं

क्या जानिए अहद-ए-नौ कब आए
अब तक तो पुराने सिलसिले हैं