उर्दू शायरी · ग़ज़ल

hath mein hai ek purani Diary

हाथ में है इक पुरानी डाइरी

ہاتھ میں ہے اک پرانی ڈائری

शायर: Hafeez Jauhar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

हाथ में है इक पुरानी डाइरी
खोलने बैठा हूँ गिर्हें याद की

उस से वा'दा है मिलेंगे शाम को
शाम कितनी देर के बाद आएगी

हम ने सोचा था चलेंगे सैर को
रास्तों ने फिर सफ़ेदी ओढ़ ली

गर्म कमरों से निकलता कौन है
महफ़िलें उजड़ी हुई हैं शहर की

चुभ रही है मेरी आँखों में बहुत
चार-सू फैली हुई बे-मंज़री

प्यार की ख़ुशबू से ख़ाली निस्बतें
राब्ते सब दिल के रंगों से तही

इक तअ'ल्लुक़ बनते बनते रह गया
खिलते खिलते इक कली मुरझा गई