उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye imtihan ki ghaDi hai ghazal ka saz uTha

ये इम्तिहाँ की घड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

یہ امتحاں کی گھڑی ہے غزل کا ساز اٹھا

शायर: V. C. Rai Naya7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये इम्तिहाँ की घड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा
अना पे आन पड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

घटा उमड़ के जो बरसों थमी थी आँखों में
बरस वो आज पड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

पिरो के अश्क गुंथे शे'र हो गई लो ग़ज़ल
ये मोतियों की लड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

जिसे तलाश न पाया कोई तसव्वुर में
उसी से आँख लड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

सफ़र में ज़ीस्त के साए ग़ज़ल के साथ रहें
अगरचे धूप कड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

थका है लाख मुसाफ़िर सफ़र तमाम सही
अभी भी उम्र पड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा

तुझे जहान की हर इक ख़ुशी मिलेगी 'नया'
ग़मों की भीड़ खड़ी है ग़ज़ल का साज़ उठा