उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo zaban apni kholta hi nahin

वो ज़बाँ अपनी खोलता ही नहीं

وہ زباں اپنی کھولتا ہی نہیں

शायर: V. C. Rai Naya7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो ज़बाँ अपनी खोलता ही नहीं
ये नहीं है कि बोलता ही नहीं

हर अदा उस की कुछ तो है कहती
तू मगर आँख खोलता ही नहीं

जितना तुम दोगे उतना पाओगे
कम ज़ियादा वो तोलता ही नहीं

वो चमन की बहार क्या जाने
जो दरीचों को खोलता ही नहीं

बंद आँखें तराज़ू हाथ में है
वो मगर कुछ भी तोलता ही नहीं

जब युधिष्ठिर भी सच पे टिक न सके
आइना सच से डोलता ही नहीं

क्यूँ न हो कड़वी तेरी बात 'नया'
झूट तू इस में घोलता ही नहीं