उर्दू शायरी · ग़ज़ल

ye baat munkashif hui charagh ke baghair bhi

ये बात मुन्कशिफ़ हुई चराग़ के बग़ैर भी

یہ بات منکشف ہوئی چراغ کے بغیر بھی

शायर: Rafique Khayal7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

ये बात मुन्कशिफ़ हुई चराग़ के बग़ैर भी
मैं ढूँढ़ लूँगा हर ख़ुशी चराग़ के बग़ैर भी

हुआ था जिस जगह कभी विसाल-ए-यार दोस्तो
है उस जगह पे रौशनी चराग़ के बग़ैर भी

लिखी गई हैं जिस के साथ ज़िंदगी की मंज़िलें
वो आ मिलेगा आदमी चराग़ के बग़ैर भी

मसर्रतों के क़ाफ़िले लुटा रही है फिर मुझे
तिरी ये ख़ुद-सुपुर्दगी चराग़ के बग़ैर भी

मैं तज़्किरा करूँ तो क्या करूँ जमाल-ए-यार का
दमक रही थी दिलकशी चराग़ के बग़ैर भी

तुम्हारी एक याद बे-शुमार हसरतों के रंग
निगाह में सजा गई चराग़ के बग़ैर भी

गिला किसी से क्यूँ करूँ गुज़र ही जाएगी 'ख़याल'
ये मुख़्तसर सी ज़िंदगी चराग़ के बग़ैर भी