उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo nahin mera magar hai rabta apni jagah

वो नहीं मेरा मगर है राब्ता अपनी जगह

وہ نہیں میرا مگر ہے رابطہ اپنی جگہ

शायर: Sabaa Chhabbi S S5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो नहीं मेरा मगर है राब्ता अपनी जगह
है वफ़ा के उस सफ़र की इंतिहा अपनी जगह

अब तक़ाज़ा क्यों करूँ तेरी 'इनायत का भी मैं
इल्तिजा तो है मुनासिब गो सिला अपनी जगह

इक ज़माने से हुआ था उन की चाहत का भरम
करवटें लेती रही लेकिन दु'आ अपनी जगह

उन से कहते हम मगर कुछ होंट ऐसे सिल गए
उन को खो देने का डर था गो अना अपनी जगह

वो तो उड़ता रह गया है ख़ुश्बू-ए-गुल में मगर
प्यार की सरहद पे ज़िंदा है 'सबा' अपनी जगह