उर्दू शायरी · ग़ज़ल

phir wahi be-kasi ka saya hai

फिर वही बे-कसी का साया है

پھر وہی بے کسی کا سایا ہے

शायर: Sabaa Chhabbi S S5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

फिर वही बे-कसी का साया है
ग़म ने फिर आज हक़ जताया है

मेरा हो के नहीं हुआ मेरा
टूट कर दिल ने ये सिखाया है

प्यार है या ये इम्तिहाँ या-रब
हर क़दम हम को आज़माया है

हाँ तलबगार हैं किसी के हम
दिल ने उस से ये क्यों छुपाया है

बारिशों ने डुबो दिया जिस को
मैं ने वो आशियाँ बनाया है