उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wo husn husn-e-badan kab kisi ko dekhta hai

वो हुस्न हुस्न-ए-बदन कब किसी को देखता है

وہ حسن حسن بدن کب کسی کو دیکھتا ہے

शायर: Osaama ameer8 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वो हुस्न हुस्न-ए-बदन कब किसी को देखता है
ख़ुद अपने मा'नी-ओ-मफ़्हूम ही को देखता है

गुज़र रही है इन आँखों के सामने से बहार
ठहर ठहर के ये दिल उस गली को देखता है

ये दिल कि अस्ल में बे-दीद ही की रू से है
पुकारता है किसी को किसी को देखता है

नहीं खुलेगा किसी तरह हुस्न-ए-आराइश
तू किस लिहाज़ से इस सादगी को देखता है

'अबस है पाँव की ज़ंजीर देखना हर सुब्ह
जुनूँ-शि’आर कहाँ बे-कसी को देखता है

वो टूटते हुए एहसास छूटते हुए लोग
तू दूर होती हुई ज़िंदगी को देखता है

निहाँ था सब से वो इक फूल जो कि ज़ख़्म बना
'अयाँ हुआ तो ज़माना उसी को देखता है

वो पेशतर किसी ना-दीद की तलाश में था
पनाह के लिए अब शा'इरी को देखता है