उर्दू शायरी · ग़ज़ल

viran sa ab hun jo main aisa to nahin tha

वीरान सा अब हूँ जो मैं ऐसा तो नहीं था

ویران سا اب ہوں جو میں ایسا تو نہیں تھا

शायर: Fahmida Mosarrat Ahmad9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वीरान सा अब हूँ जो मैं ऐसा तो नहीं था
होता था समुंदर कभी सहरा तो नहीं था

चेहरे पे रक़म था जो वो पढ़ ही नहीं पाया
सब जानता था इतना भी सादा तो नहीं था

आँगन में मिरे दिल के चली आई थी कल शाम
थी याद तुम्हारी कोई झोंका तो नहीं था

चुप-चाप तसव्वुर में चले आते किसी रोज़
सोचों पे मेरी जाँ कोई पहरा तो नहीं था

हम दर्द का अफ़्साना सुनाते उसे क्यूँ-कर
ज़ाहिर में जो अपना था पर अपना तो नहीं था

सब चल दिए मौजों के हवाले उसे कर के
माना कि भँवर में था वो डूबा तो नहीं था

वो जिस को था सीने का हर इक ज़ख़्म दिखाया
बातों पे मिरी उस को भरोसा तो नहीं था

कर के मुझे बर्बाद गया है वो सितमगर
गुलशन यूँही दिल का मिरे उजड़ा तो नहीं था

क्यों रोता है अब हिज्र में तेरे वो 'मसर्रत'
जाते हुए उस ने तुझे रोका तो नहीं था