उर्दू शायरी · ग़ज़ल

wasl bhi hijr tha visal na tha

वस्ल भी हिज्र था विसाल न था

وصل بھی ہجر تھا وصال نہ تھا

शायर: Yashab Tamanna6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

वस्ल भी हिज्र था विसाल न था
मिल रहे थे मगर ख़याल न था

मिल रहे थे कि दोनों तन्हा थे
गुफ़्तुगू में भी क़ील-ओ-क़ाल न था

मेरे और उस के दरमियान अभी
कोई भी सिलसिला बहाल न था

रास्ते ख़त्म हो चुके थे मगर
वापसी का कोई सवाल न था

ये भी इक मरहला तमाम हुआ
हो गए थे जुदा मलाल न था

वो तिरा हुस्न हो कि इश्क़ मिरा
कोई पाबंद-ए-माह-ओ-साल न था