उर्दू शायरी · ग़ज़ल

uThne ko to uTTha hun mahfil se teri lekin

उठने को तो उट्ठा हूँ महफ़िल से तिरी लेकिन

اٹھنے کو تو اٹھا ہوں محفل سے تری لیکن

शायर: Hadi Machlishahri4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उठने को तो उट्ठा हूँ महफ़िल से तिरी लेकिन
अब दिल को ये धड़का है जाऊँ तो किधर जाऊँ

मरना मिरी क़िस्मत है मरने से नहीं डरता
पैमाना-ए-हस्ती को लबरेज़ तो कर जाऊँ

तू और मिरी हस्ती में इस तरहा समा जाए
मैं और तिरी नज़रों से इस तरहा उतर जाऊँ

दुनिया-ए-मोहब्बत में दुश्वार जो जीना है
मर कर ही सही आख़िर कुछ काम तो कर जाऊँ