उर्दू शायरी · ग़ज़ल

un ke is kufr-e-bayan se kitne afsane bane hain

उन के इस कुफ़्र-ए-बयाँ से कितने अफ़्साने बने हैं

ان کے اس کفر بیاں سے کتنے افسانے بنے ہیں

शायर: Urooj Zaidi Badayuni11 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

उन के इस कुफ़्र-ए-बयाँ से कितने अफ़्साने बने हैं
आप दीवाने नहीं हैं आप दीवाने बने हैं

जब हवा का रुख़ ज़रा बदला तो अफ़्साने बने हैं
ख़ून का रिश्ता था जिन से वो भी बेगाने बने हैं

हम तो नाम-ए-दोस्त को गिन गिन के लेना कुफ़्र समझे
ज़ाहिदों के वास्ते तस्बीह के दाने बने हैं

हुस्न का जज़्ब-ओ-असर क्या आइना-सामाँ नहीं है
शम्अ' नादीदा है लेकिन लोग परवाने बने हैं

मौत से टकरा के जीना उन की शान-ए-ज़िंदगी है
हरचे बादा-बाद कहने वाले दीवाने बने हैं

इंक़िलाब-ए-वक़्त से पहले की दुनिया अब कहाँ है
जिन में रक़्साँ चाँदनी थी वो सियह-ख़ाने बने हैं

हम में कुछ अपनी जगह हैं दानिश-ओ-बीनिश से आरी
और बनने का ये आलम है कि फ़रज़ाने बने हैं

बहस है इस मसअले पर ख़ल्वतों में जल्वतों में
किस ने दीवाना बनाया कितने दीवाने बने हैं

जिस तरह हर फूल की ख़ुश्बू अलग रंगत जुदा है
फ़ितरत-ए-इंसाँ भी यूँही अपने बेगाने बने हैं

उस के होते साग़र-ओ-सहबा की गुंजाइश नहीं है
जिस की आँखों के नमूने पर ही मयख़ाने बने हैं

हम हक़ीक़त ही हक़ीक़त हैं 'उरूज' इस ख़ाक-दाँ में
इस हक़ीक़त को भुला देने से अफ़्साने बने हैं