उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tasawwur ki nazakat baDh ke jab meyar tak pahunchi

तसव्वुर की नज़ाकत बढ़ के जब मे'यार तक पहुँची

تصور کی نزاکت بڑھ کے جب معیار تک پہنچی

शायर: Qaisar Ansari5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तसव्वुर की नज़ाकत बढ़ के जब मे'यार तक पहुँची
जो सूरत सामने आई मिरे अश'आर तक पहुँची

दो-रोज़ा ज़िंदगी की लग़्ज़िशों में तूल है कितना
ज़रा सी बात बढ़ कर हश्र के बाज़ार तक पहुँची

फ़ज़ा-ए-गुलसिताँ पर एक सन्नाटा हुआ तारी
असीरान-ए-क़फ़स की आह जब गुलज़ार तक पहुँची

वो हुस्न-ए-ज़िंदगी इस दौर में पैदा करे कोई
ज़ुलेख़ा जिस को लेने मिस्र के बाज़ार तक पहुँची

मु'अम्मा दुश्मनी का दोस्ती से हल हुआ 'क़ैसर'
मिरी शरह-ए-मोहब्बत जब लब-ए-अग़्यार तक पहुँची