उर्दू शायरी · ग़ज़ल

karun raushan main kab tak KHun se gham ke shabistan ko

करूँ रौशन मैं कब तक ख़ून से ग़म के शबिस्ताँ को

کروں روشن میں کب تک خون سے غم کے شبستاں کو

शायर: Qaisar Ansari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

करूँ रौशन मैं कब तक ख़ून से ग़म के शबिस्ताँ को
तबी'अत चाहती है फूँक दूँ जश्न-ए-चराग़ाँ को

वहाँ पहुँचा दिया है मुझ को ‘इरफ़ान-ए-हक़ीक़त ने
जहाँ चेहरे से पहचाना है मैं ने ज़र्फ़-ए-इंसाँ को

तजल्ली मा'रिफ़त ख़ल्वत तसव्वुफ़ 'इश्क़ क्या शय है
मिरी लग़्ज़िश बताएगी ये बातें अहल-ए-'इरफ़ाँ को

मुझे ऐ नाख़ुदा ख़तरों से क्यों आगाह करता है
लब-ए-साहिल पहुँच कर देख लूँगा नब्ज़-ए-तूफ़ाँ को

असीरान-ए-क़फ़स पर तब्सिरे का हक़ नहीं उन को
जो हद्द-ए-आशियाँ से देखते रहते हैं ज़िंदाँ को

नहीं होता उन्हें कुछ ख़ौफ़ तूफ़ान-ओ-हवादिस का
जो बहर-ए-ग़म में अपना हम-सफ़र रखते हैं तूफ़ाँ को

हक़ीक़त में सुख़न-फ़हमी बहुत मुश्किल है ऐ 'क़ैसर'
समझने में ग़लत-फ़हमी भी हो सकती है इंसाँ को