उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aa gae to aur bhi nazdik aana chahiye

आ गए तो और भी नज़दीक आना चाहिए

آ گئے تو اور بھی نزدیک آنا چاہیے

शायर: Qaisar Ansari7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आ गए तो और भी नज़दीक आना चाहिए
अब पुरानी रंजिशों को भूल जाना चाहिए

हम जहाँ थे उस सतह से और नीचे आ गए
उस ज़माने तक पहुँचने को ज़माना चाहिए

ऐ जुनूँ कुछ देर ये शुग़्ल-ए-हवा-ख़ोरी सही
ख़ुश्क पत्तों को हवाओं में उड़ाना चाहिए

घर में हम महफ़ूज़ रह कर भी हिफ़ाज़त से नहीं
शहर का मौसम बदलने को ज़माना चाहिए

पाओं में ज़ंजीर और हाथों में है सैफ़-ओ-क़लम
सोचिए इस शहर में रहना कि जाना चाहिए

लर्ज़ां लर्ज़ां थरथराहट का असर जिस में न हो
ज़लज़लों के सामने वो आशियाना चाहिए

नाज़ुकी यूँ है ग़ज़ल की धूप में जैसे गुलाब
साया साया शे'र ऐ 'क़ैसर' सुनाना चाहिए