उर्दू शायरी · ग़ज़ल

Tapakte sholon ki barsat mein nahaunga

टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा

ٹپکتے شعلوں کی برسات میں نہاؤں گا

शायर: Badnam Nazar7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

टपकते शो'लों की बरसात में नहाउँगा
अब आ गया हूँ तो इस शहर से न जाऊँगा

कशिश है घर में न बाहर की रौनक़ें बाक़ी
यूँही रहा तो कहाँ जा के मुस्कराउँगा

ये गीली गीली सी ख़ुशबू ये नर्म नर्म निगाह
तुम्हारे पास रहा मैं तो भीग जाऊँगा

बसा सको तो बसा लो मुझे ख़यालों में
कि इस दियार में दोबारा मैं न आऊँगा

क़दम समेट के चलना भी सीख जाओगे
तुम्हें मैं गाँव की पगडंडियाँ दिखाऊँगा

चला था ढूँडने मैं ज़िंदगी की बुनियादें
पता न था कि ख़ुद अपना पता न पाऊँगा

न हूँगा मैं तो मिरी दास्तान होगी 'नज़र'
ज़मीं पे धूप की सूरत मैं फैल जाऊँगा