उर्दू शायरी · ग़ज़ल

girti diwaron pe kuchh parchhaiyan rahne lagin

गिरती दीवारों पे कुछ परछाइयाँ रहने लगीं

گرتی دیواروں پہ کچھ پرچھائیاں رہنے لگیں

शायर: Badnam Nazar4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

गिरती दीवारों पे कुछ परछाइयाँ रहने लगीं
घर को वीराँ देख कर तन्हाइयाँ रहने लगीं

ताकि ज़िंदा रह सके हर ज़ख़्म-ए-दिल की ताज़गी
साथ मेरे हर घड़ी पुरवाइयाँ रहने लगीं

झूमती शाख़ों में कोई फल या फूल आता नहीं
बाँझ पेड़ों में फ़क़त अंगड़ाइयाँ रहने लगीं

हक़ की राहों पर बहुत दुश्वार है चलना नज़र
मेरे पीछे पीछे बस रुस्वाइयाँ रहने लगीं