उर्दू शायरी · ग़ज़ल

aalam-e-KHwab bahar-haal sajae rakhiye

आलम-ए-ख़्वाब बहर-हाल सजाए रखिए

عالم خواب بہر حال سجائے رکھیے

शायर: Badnam Nazar9 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

आलम-ए-ख़्वाब बहर-हाल सजाए रखिए
गर्दनें जाएँ मगर सर को बचाए रखिए

कोई तूफ़ान सर-ए-राह उठाए रखिए
सिलसिला हम से न मिलने का बनाए रखिए

कोई मौसम हो बहारों से बनाए रखिए
ख़ुश्क पत्तों पे कोई रंग चढ़ाए रखिए

इस सियह रात में इक सब्ज़ परी उतरेगी
ख़्वाब-ए-तिफ़्ली को बहर-हाल जगाए रखिए

प्यास जिस्मों की बुझा करती है यूँ भी अक्सर
एक तस्वीर सिरहाने में लगाए रखिए

वक़्त जाने कि ख़ुदा पहले भी था कोई यहाँ
नक़्श पत्थर पे फ़रिश्तों के बनाए रखिए

लफ़्ज़ के पास न भटकें ये हैं बेहिस पत्थर
दर्द-ए-एहसास के शीशे को बचाए रखिए

ताकि वीरानी इधर आए तो मायूस न हो
अपने दरवाज़ों को फूलों से सजाए रखिए

आज की रात 'नज़र' ज़ख़्म मिरे चमकेंगे
आज की रात चराग़ों को बुझाए रखिए