उर्दू शायरी · ग़ज़ल

taKHtiyan sab utar di gai hain

तख़्तियाँ सब उतार दी गई हैं

تختیاں سب اتار دی گئی ہیں

शायर: Tabinda Sahar Abidi6 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तख़्तियाँ सब उतार दी गई हैं
मिरे घर का कहीं पता ही नहीं

रेग-ए-बिरयाँ पे चल के आए हैं
पाँव में कोई आबला ही नहीं

ज़ख़्म-ए-दिल को तलाश-ए-मरहम थी
और मरहम कहीं मिला ही नहीं

हम ने दस्तक तो दी बहुत लेकिन
फिर कोई दर कभी खुला ही नहीं

ज़िंदगी से कभी बनी न मिरी
मौत पर इख़्तियार था ही नहीं

धूप भी क़हर बन के बरसी और
साएबाँ रेत से बना ही नहीं