उर्दू शायरी · ग़ज़ल

tabahi ka apni nishan chhoD aae

तबाही का अपनी निशाँ छोड़ आए

تباہی کا اپنی نشاں چھوڑ آئے

शायर: Kaif Azimabadi4 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

तबाही का अपनी निशाँ छोड़ आए
वरक़-दर-वरक़ दास्ताँ छोड़ आए

हर इक अजनबी से पता पूछते हैं
तुझे ज़िंदगी हम कहाँ छोड़ आए

वही लोग जीने का फ़न जानते हैं
जो एहसास-ए-सूद-ओ-ज़ियाँ छोड़ आए

निकल आए तन्हा तिरी रह-गुज़र पर
भटकने को हम कारवाँ छोड़ आए