उर्दू शायरी · ग़ज़ल

suraj chhupa ek ik gul-e-manzar bikhar gaya

सूरज छुपा इक इक गुल-ए-मंज़र बिखर गया

سورج چھپا اک اک گل منظر بکھر گیا

शायर: Jafar Shirazi5 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सूरज छुपा इक इक गुल-ए-मंज़र बिखर गया
शो'ला सा कोई दिल में उतर कर बिखर गया

था चाँदनी का जिस्म कि शीशे का था बदन
आई हवा तो गिर के ज़मीं पर बिखर गया

कल हँस के रेग-ए-दश्त से कहती थी ज़िंदगी
मैं ने छुआ ही था कि वो पत्थर बिखर गया

नद्दी पे एक नर्म किरन ने रखा जो पाँव
चारों तरफ़ सदा का समुंदर बिखर गया

'जाफ़र' हमारा दिल भी है वो आइना कि बस
खाई ज़रा निगाह की ठोकर बिखर गया