उर्दू शायरी · ग़ज़ल

sochta hun raat jo suraj tha daen hath mein

सोचता हूँ रात जो सूरज था दाएँ हाथ में

سوچتا ہوں رات جو سورج تھا دائیں ہاتھ میں

शायर: Kaif Ahmed Siddiqui7 अशआरउपलब्ध: हिंदी, Roman Urdu, उर्दू

सोचता हूँ रात जो सूरज था दाएँ हाथ में
सुब्ह कैसे ढल गया वो मेरे बाएँ हाथ में

हम अगर कुछ और अपने ज़ेहन-ओ-दिल रौशन करें
दोस्तो ये माह-ओ-अंजुम जगमगाएँ हाथ में

हल न हो पाया अगर क़हत-ए-ज़मीं का मसअला
ये भी मुमकिन है कि हम फ़स्लें उगाएँ हाथ में

दश्त-ए-चश्म-ओ-क़ल्ब में भी जो नज़र आता नहीं
आओ हम तुम को वही मंज़र दिखाएँ हाथ में

जब हिसार-ए-ख़ौफ़ से आज़ाद हो जाता है दिल
क़ैद हो जाती हैं तब सारी बलाएँ हाथ में

जब मिरी साँसों से ये माहौल यख़-बस्ता हुआ
मुंजमिद होने लगीं जलती हवाएँ हाथ में

शायरी की ये शब-ए-तारीक ढलती ही नहीं
'कैफ़' कब तक हम चराग़-ए-फ़न जलाएँ हाथ में